आध्यात्मिकता का अर्थ – निःस्वार्थ प्रेम का विज्ञान

आध्यात्मिकता का अर्थ और सत्य

अधिकांश धर्मों में विभिन्न देवी-देवताओं को कुछ गुणों का धारक माना जाता है, लेकिन वे शत्रुता, घृणा, पक्षपात आदि से पूरी तरह से मुक्त नहीं हैं। इनमें से कुछ उच्च देवता हैं जो भगवान की सहायता करते थे, जब भगवान का अवतार समाजिक बुराइयों और दुष्टों का विनाश तथा संतों के साथ-साथ आम लोगों के प्रति प्रेम के लिए होता था।

किसी भी साधक को देवत्व धारण करके तथा उपरोक्त दुर्गुणों को छोड़कर सभी के लिए प्रेम व्यवहार अपनाकर आध्यात्मिकता के क्षेत्र में प्रवेश करना होता है।

समाज में राक्षसी प्रवृत्ति के लोग वे हैं जो अपने लालसापूर्ण उद्देश्य की पूर्ति हेतु किसी भी प्रकार से – शारीरिक बल, धन या अपने सहयोगियों बल पर छीनने की कोशिश करते हैं। वे सभी प्रकार का आनंद लेना चाहते हैं और लालसा, विषय-वासना और इच्छाओं के दास हैं। क्रूरता, उद्देश्यरहित विनाश और अकारण ही शोषण दूसरों का शोषण करना या कष्ट देना तो शैतानों का स्वभाव है ।

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये सभी प्रकार के लोग दुनिया में हैं और वे अपने स्वयं के हितों की रक्षा करते हैं या अपने शौक और कल्पनाओं को पूरा करते हैं। इस प्रकार, मानव जाति ने स्वर्ग और नरक को पृथ्वी पर बना रखा है।

आध्यात्मिकता तब शुरू होती है जब कोई व्यक्ति मानव जाति के बीच प्रेम का प्रसार करने के लिए ईश्वर के मिशन में मदद करता है। ऐसे व्यक्तियों का दैवीय स्वभाव लोगों के द्वारा सम्मान और अनुगमन किया जाता है जबकि राक्षसी स्वभाव के लोग उनका विरोध तथा शैतान उन्हें कष्ट देते हैं।

आध्यात्मिकता पर चलने वाले व्यक्ति को दैवीय गुणों को ईश्वर से प्रेम की खातिर अपनाना चाहिए न की निजी लाभ के लिए। उसे अपने दैवीय गुणों में से किसी पर गर्व नहीं होना चाहिए, अन्यथा दोषों के माध्यम से उसका पतन निश्चित है।

यहां मैं यह उल्लेख करना चाहूंगा कि सभी प्रकार के लोग अपनी भौतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए विभिन्न देवताओं, राक्षसों और शैतानों के प्रति समर्पित हैं। उच्च देवताओं का भक्त बनना जो आवश्यक गुणों से सम्पन्न एवं जिन्होंने अवतारित भगवान के समय में उनकी सहायता की थी ऐसे देवताओं को उनके लक्ष्य के अनुसार भगवान की सेवा करना, किसी को आध्यात्मिकता मार्ग पर ले जाता है।

मैं देवताओं के गुणों पर विश्वास करता था और मेरे जीवन में उनका पालन करने की कोशिश करता था, हालांकि, मैं कोई मूर्ति पूजा नहीं करता था और मैंने किसी भी देवता से सांसरिक इच्छा पूरी करने के लिए कोई अनुष्ठान नहीं किया। मेरा विश्वास था कि उनके गुणों को जीवन तथा कर्मों में अपनाया जाए। सबसे पहले, मैं हनुमानजी को समर्पित था जो बुद्धि (बल, बुद्धि और विद्या) का प्रतीक हैं, फिर ‘धैर्य’ की देवी (माँ संतोषी) और अंत में सभी प्राणियों पर ‘करुणा’ बरसाने वाले शिवजी।

उपरोक्त गुणों को कुछ हद तक प्राप्त करने के बाद मुझे आत्मा का अनुभव हुआ (लेख देखें: मौत – एक महान आध्यात्मिक शिक्षक, वास्तव में!)। इसके बाद मैं भगवान राम के लिए समर्पित था, एक अवतारित भगवान, जिन्होंने राक्षसों को धरती पर जीत लिया था। उनके मुख्य गुण थे – राजा होते हुए भी एक पत्नी व्रतधारी, संत समागम, राक्षसप्रवृत्ति के लोगों को खत्म करना, और आदर्श राज्य की स्थापना करना।

अंत में मेरे जीवन में भगवान श्रीकृष्ण ने प्रवेश किया जिन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ पढ़ाया और धीरे-धीरे मुझे मृत्यु भय से मुक्त किया। साधना के विभिन्न रास्तों को समझा और भगवान और उनकी सृष्टि के लिए भक्ति का विकास हुआ। भगवान के साथ मेरे प्यार की शुरुआत दास्य भाव से हुई, फिर यह धीरे-धीरे मित्रता, अभिभावक, और अंत में उसके लिए पूर्ण प्यार (माधुर्य भाव) का संबंध मन में समाया।

इस प्रकार, मेरे मन को सर्वश्रेष्ठ चेतना प्राप्त हुई और अखंड आनंद के साम्राज्य में प्रवेश मिला। मुझे लगता है कि जब तक स्वयं आत्मा की अवस्था तक नहीं पहुंच जाते, तब तक साधक को दृढ़ विश्वास और ईमानदारी से प्रयास जारी रखना पड़ता है। आत्म-प्राप्ति में साधक निराकार ब्रह्म की प्राप्ति होती है और जीवन उसका मिशन समाप्त हो जाता है। लेकिन उसके बाद साधक को अपनी आत्मा को प्रेमानन्द के स्वाद के लिए एक व्यक्तिगत भगवान को आत्म समर्पण करना पड़ता है।

फिर, वह संत बनकर मानव जाति के बीच निस्वार्थ प्रेम फैला सकते हैं।

आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित यह लेख हमें स्वामी प्रसाद शर्मा जी ने भेजा है| स्वामी जी के अन्य लेख भी हिंदीसोच पर प्रकाशित होते आये हैं| स्वामी जी के सभी लेख उच्च कोटि के हैं, यहाँ हम उनके लेखों की लिस्ट दे रहे हैं जिन्हें आप पढ़ सकते हैं..

प्रसाद जी के पूर्व प्रकाशित लेख इस प्रकार हैं:-

मानव जीवन क्या है

जीवन का लक्ष्य क्या है ?

मानव मन और ब्रह्मांड की सीमा

मृत्युदेव : अध्यात्म के महान गुरु

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