जानिए अप्पिको आंदोलन का इतिहास –  Appiko Movement

Appiko movement

उत्तराखंड में पर्यावरण को बचाने के लिए चलाया गया चिपको आंदोलन दक्षिण भारत में अप्पिको आंदोलन – Appiko movement के रूप में सामने आया। पर्यावरण के महत्व को समझते हुए और दक्षिण भारत के  पेड़ों को काटने से रोकने के लिए कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन चलाया गया।

अप्पिको का अर्थअप्पिको एक कन्नड़ भाषा का शब्द है जो कि चिपको का पर्याय ही है। इस प्रकार अप्पिको का भी अर्थ है चिपक जाना या लिपट जाना।

आपको बता दें कि लगातार खत्म हो रही वन संपदा, अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और विलुप्त  हो रहे जंगली जीव-जन्तु और जंगल खत्म होने से पर्यावरण पर पड़े रहे बुरे प्रभाव को देखते हुए दक्षिण भारत के लोगों ने पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के लिए एक अभियान चलाया।

Appiko movement – अप्पिको आंदोलन 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र में शुरू हुआ। यह आंदोलन पूरे जोश से लगातार 38 दिन तक चलता रहा।

Aappiko movement

जानिए अप्पिको आंदोलन का इतिहास –  Appiko Movement

पर्यावरण को लेकर जागरूक करने और पेड़ों की रक्षा के लिए चलाया गया अप्पिको आंदोलन की शुरुआत 1983 में कर्नाटक के सिलकानी गांव से हुई थी। पेड़ों को कटने से बचाने के लिए सिलकानी और आस-पास के गांव वाले पास के जंगलों तक करीब 5 मिल की यात्रा करके आए और चिपको आंदोलन की तरह ही इस आंदोलन में पेड़ों को गले से लगा लिया।

और इस तरह यहां के लोगों ने राज्य के वन विभाग की तरफ से कट रहे पेड़ों पर रोक लगवाई और यहां के जंगलों के हरे पेड़ काटे जाने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। अप्पिको आंदोलन – Appiko movement भी पूरी तरह से अहिंसक आंदोलन था, गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर लोगों ने अप्पिको आंदोलन को शांतिपूर्वक चलाया।

वहीं जब वन विभाग के कुछ अधिकारी कर्नाटक के पास के जंगल के पेड़ काटने आए तो यहां के लोग पेड़ से चिपक गए और कहा कि पहले उन्हें काटना होगा और  फिर पेड़ों को काटना होगा।

जिसके बाद पेड़ काटने आए वन विभाग के अधिकारियों को इन लोगों के सामने घुटने टेकने पड़े और उन्हें  बिना पेड़ काटे ही वापस जाना पड़ा। वहीं धीरे-धीरे इस आंदोलन का विस्तार होता चला गया। इस तरह अप्पिको आंदोलन – Appiko movement ने पूरे दक्षिण भारत में पर्यावरण के प्रति जागरूता फैलाई।

आपको बता दें कि दक्षिण भारत में पहले पारिस्थितिकी तंत्र बेहद मजबूत था, लेकिन धीमे-धीमे जंगलों के दोहन से यह तंत्र नष्ट होने की कगार पर आ गया।  वहीं अगर 1950 की बात करें तो कन्नड़ जिले  के भौगोलिक क्षेत्र के 81 फीसदी से ज्यादा जंगल शामिल थे।

लेकिन विकास के लिए जंगलों के दोहन की वजह से 1980 में जंगलों का वनक्षेत्र महज 25 फीसदी तक ही रह गया क्योंकि सरकार ने इस जंगल वाले जिले को “पिछड़ा” क्षेत्र घोषित किया, फिर “विकास” की प्रक्रिया शुरू की। उस समय वहां का मुख्य व्यवसाय – Pulp & paper mill , एक प्लाईवुड कारखाना और Power के लिए बिजली प्रोजेक्ट थे आपको बता दें कि बिजली प्रोजक्ट के तहत नदियों पर बांधो की एक सीरीज बनानी चालू कर दी गई थी।

वहीं इन उद्योगों ने जंगल संसाधनों का जमकर दोहन किया है, और तीसरे प्रोजेक्ट के लिये नदियों पर बनाए गए बांधों के कारण वनों एंव कृषि का बहुत बड़ा क्षेत्र जलमग्न हो गए। जिसके चलते वनक्षेत्र में काफी कमी आ गई। स्थानीय आबादी, खासकर सबसे गरीब समूह के लोगों को बांधों की वजह से विस्थापित कर दिया गया।

वनों में वृक्षों की मिश्रित प्रजातियों की जगह यूकेलिप्टस और सागवान का वृक्षारोपण किया गया। जिनसे पानी के श्रोत सूख गये। वहीं इस तथाकथित विकास से वनवासियों को प्रभावित किया। यहीं से अप्पिको आंदोलन की शुरुआत हुई।

जबकि केरल में 1950 से 1984 के वनक्षेत्र की बात करें तो हालात ये हुए कि 44 फीसदी वनक्षेत्र से महज 9 फीसदी वनक्षेत्र ही रह गया। फिलहाल 1980 के दशक में शुरु हुए अप्पिको आंदोलन – Appiko movement में पर्यावरण को बचाने के लिए अन्य जगहों के लोगों को भी प्रेरित किया।

आपको बता दें कि अप्पिको आन्दोलन में पांडुरंग हेगड़े जी की प्रमुख भूमिका रही है। जो कि एक जमाने में दिल्ली विश्वविद्यालय से सामाजिक कार्य में गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। अपनी पढ़ाई के दौरान वे चिपको आन्दोलन में शामिल हुए और फिर जब उनकी मुलाकात चिपको आंदोलन में मुख्य रोल अदा करने वाले सुन्दरलाल बहुगुणा से हुई।

उसके बाद उन्होंने अपनी जिन्दगी की दिशा ही बदल दी। कुछ समय मध्य प्रदेश के दमोह में लोगों के बीच काम किया और अपने गांव लौट आए। जहां उन्होनें देखा की वन संपदा नष्ट हो रही है, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है, जीव-जन्तु विलुप्त होते जा रहे हैं और खनन माफिया जंगलों का खनन कर रहे हैं।

जिसके बाद उन्होनें काली नदी के आसपास पदयात्रा शुरू की। पद यात्रा के दौरान उन्होनें देखा कि जंगलों की कटाई हो रही थी, जिसके बाद उन्होनें ग्रामीणों के साथ मिलकर पेड़ों की कटाई पर रोक लगवाने का फैसला लिया। वहीं सबसे पहले सलकानी गांव के पास करीब 150 महिलाओं और पुरुषों ने जंगलों की पदयात्रा की। जहां वन विभाग के आदेश पर पेड़ों को काटा जा रहा था।

जिसके बाद वन विभाग के अधिकारियों को लोगों ने रोका और वे पेड़ों से चिपक गए आखिरकार, वे पेड़ों को बचाने में सफल हुए। इस तरह अप्पिको आन्दोलन की चर्चा अन्य जगहों पर भी फैल गई।

वहीं जब ये अप्पिको आंदोलन – Appiko movement कर्नाटक के बेनगांव के आदिवासी आबादी क्षेत्र में फैला तब वहां के लोगों ने देखा कि बांस के पेड़ जिनसे उनकी अजीविका चल रही थी।

वहां के लोगों के रोजगार करने का एक मात्र साधन था जैसे कि चटाई बनाना, टोकरी बनाना या फिर घर का निर्माण कर वे लोग अपना जीवन-यापन करते थे। लेकिन पेड़ों अंधाधुध कटाई की वजह से उनकी अजीविका के साधन धीमे-धीमे गायब होते जा रहे थे।

इसलिए पेड़ों को काटने के खिलाफ आदिवासी क्षेत्र के लोगों ने भी अपनी आवाज बुलंद की और उन्होनें पेड़ों को गले लगाकर, पेड़ों को काटने से बचा लिया।

अप्पिको आंदोलन के तहत फैलाई जागरूकता – Success of The Appiko Movement

पर्यावरण को संरक्षित करने करने के लिए चलाया गया अप्पिको आंदोलन, एक ऐसा आंदोलन बना जिसने बहुत कम समय में ही अभूतपूर्व सफलता हासिल की। आपको बता दें कि साल 1990 में  कर्नाटक सरकार ने पेड़ों की कटाई को रोकने की मांग को मान लिया था।

लेकिन इसके बाद भी अप्पिको आंदोलन ने पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए कई तरह के प्रयास जारी रखे गए। खाना बनाने या फिर अन्य काम के लिए पेड़ों से ईंधन की लकड़ी की जरूरत कम करने के लिए तेजी से अन्य ऊर्जा के स्त्रोत चूल्हे का प्रचार-प्रसार किया।

अप्पिको आंदोलन के माध्यम से ये भी जागरूकता फैलाई गई कि लोगों को  वनों से अपने जरूरतों के वन उत्पाद लेते समय वनों को किसी तरह की कोई हानि नहीं हो, इस बात का भी खास ख्याल रखना चाहिए।

वन अधिकारों की रक्षा के लिए भी इस आंदोलन के माध्यम से जागरूकता फैलाई गई साथ ही ये भी बतााया गया कि किस तरह से मानव जीवन में पेड़ों का महत्व है इसलिए इसके तहत पेड़ों की रक्षा करने पर भी जोर डाला गया।

इसके अलावा इस आंदोलन के माध्यम से  लोगों को इस बारे में भी जागरूक किया गया कि वन आधारित आजीविकाएं बचाने के लिए वन बचाना बेहद जरूरी है इसिलए लोगों को अपने जीवन-यापन करने के लिए  वन की अहमियत को जरूर समझना चाहिए।

अप्पिको आंदोलन ने लोगों के इसको लेकर भी जागरूक किया गया कि गांववासियों को रोजगार की कोई कमी नहीं रहे इसके साथ ही अपने सीमित साधनों में वन आधारित उपज से अच्छी गुणवत्ता के उत्पाद भी तैयार किए गए।

इसके साथ ही अप्पिको आंदोलन में मधुमक्खियों की रक्षा के लिए भी एक अभियान शुरु किया जिसके तहत ग्रामीण युवाओं को पूरी तरह से शुद्ध-शहद प्राप्त करने के तौर-तरीकों से जोड़ा गया।

अप्पिको आंदोलन के उद्देश्य – Objectives of Appiko Movement

पेड़ों की रक्षा के लिए चलाया गया अप्पिको आंदोलन – Appiko movement से दक्षिण भारत में, वन विभाग में काफी बदलाव आया इसके साथ ही पर्यावरण को संरक्षित करने के विभाग द्धारा कई सकारात्मक कदम भी उठाए गए।

इसी के साथ बिना वन संपदा नष्ट किए व्यापारिक वृक्षों को भी बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया गया। इससे कई लोगों को पर्यावरण के महत्व के बारे में जागरूक किया गया।

इसके अलावा जंगलों के दोहन और हो रहे खनन पर भी लगाम लगाने में इस अप्पिको आंदोलन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आइए अब आपको बताते हैं अप्पिको आंदोलन के उद्देश्यों के बारे में जो कि नीचे लिखे गए हैं –

  • मौजूद वन क्षेत्रों का संरक्षण करना
  • खाली जमीन पर वृक्षारोपण करना
  • प्राकृतिक संसाधनों को ध्यान में रखकर उनका इस्तेमाल करना।

आपको बता दें कि पेड़ों की रक्षा के लिए चलाए गए इस अप्पिको आंदोलन – Appiko movement के तहत सभी गांवों में व्यापारिक हितों से उनकी आजीविका के साधन जंगलो और पर्यावरण को होने वाले वाले खतरे को लेकर अलर्ट किया।

इस आंदोलन के तहत शांतिपूर्ण तरीके से गांधीवादी मार्ग के पर चलते हुए एक ऐसे पोषणकारी समाज के लिए लोगों का पथ-प्रदर्शन किया।

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