जीवन बीमाकर्तोओं ने कोविड-19 के मृत्यू दावों में से 97% केसेस का किया निपटाराः IRDAI

IRDAI की वार्षिक रिपोर्ट में ये आंकड़े प्रकाशित किये गये हैं

जीवन बीमा उद्योग ( Life insurance industry) ने COVID-19 महामारी के साल, 2020-21 के दौरान प्राप्त हुए मृत्यु दावों (death claims) में से 97 प्रतिशत से अधिक मामलों में भुगतान कर दिया है। भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI) की 2020-21 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार अब इस सेक्टर को अप्रैल 2020 और मार्च 2021 के बीच 21,836 दावे प्राप्त हुए जिनमें से 21,304 दावों का भुगतान किया गया।

इसमें प्रधान मंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (Pradhan Mantri Jeevan Jyoti Bima Yojana (PMJJBY) जो 2 लाख रुपये का जीवन कवर प्रदान करती है, उसके तहत निपटाए गए दावे शामिल हैं। जब महामारी ने भारत में दस्तक दी थी तो बीमा नियामक ने सभी जीवन और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को उनकी पॉलिसियों में दावा निपटान प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश दिया था।

सामूहिक रूप से नजर डाली जाये तो बीमाकर्ताओं ने 31 मार्च, 2021 तक 357 (1.63 प्रतिशत) दावों के निपटान के लिए लंबित COVID-19 डेथ क्लेम्स के साथ 175 या 0.8 प्रतिशत क्लेम्स को खारिज कर दिया। हालांकि यह डेटा दूसरी लहर के घातक प्रभाव को पूरी तरह से नहीं दर्शाता है। जब दूसरी लहर ने मार्च 2021 के अंत में ही देश को जकड़ लिया और अप्रैल और मई 2021 में तबाही मचा दी थी।

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यद्यिप 97.56 प्रतिशत का दावों का निपटान किया गया है लेकिन जब दावों की रकम (benefit amounts settled) की बात आती है तो यह आंकड़ा बहुत कम हो जाता है। जीवन बीमा कंपनियों ने पेश किए गए दावों की राशि का केवल 88 प्रतिशत ही भुगतान किया। जीवन बीमाकर्ताओं ने 1,617.45 करोड़ रुपये की कुल दावा राशि में से केवल 1,418.71 करोड़ रुपये का निपटान किया। पॉलिसी संख्या के हिसाब से रिजेक्ट किए गए दावों की तुलना में भुगतान की गई राशि के हिसाब से रिजेक्शन की दर बहुत अधिक यानी 5.02 प्रतिशत रही।

गौरतलब है कि बीमा अधिनियम (संशोधन), 2015 (Insurance Act (Amendment), 2015) अनिवार्य रूप से लागू होने कारण तीन साल बाद जीवन बीमा पॉलिसियों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। लेकिन जीवन बीमाकर्ता धोखाधड़ी की संभावना से बचने के लिए शुरुआती दावों की जांच करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उच्च दावा अस्वीकृति के साथ दावा लंबित होने का अनुपात बढ़ता है।

वैसे तो बीमाकर्ता और पॉलिसी का चुनाव करते समय दावा निपटान अनुपात ही एकमात्र मापदंड नहीं है जिसे आपको ध्यान में रखना चाहिए लेकिन यह एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है। यदि आप 1 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध रिस्क टर्म इंश्योरेंस कवर खरीद रहे हैं, तो बीमाकर्ता का चयन करने से पहले भुगतान की गई लाभ राशि के आधार पर दावा निपटान अनुपात का विश्लेषण जरूर कर लेना चाहिए।

 

 

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