जैन धर्म के सम्पूर्ण तीर्थस्थलों में सर्वप्रमुख तीर्थ ‘राज’ – शिखरजी – Shikharji

Shikharji

शिखरजी, जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है, शिखऱजी, दुनिया का एक ऐसा जैन तीर्थ स्थल हैं, जहां हर साल लाखों की संख्या में जैन धर्म के अनुयायी दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

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जैन धर्म के सम्पूर्ण तीर्थस्थलों में सर्वप्रमुख तीर्थ ‘राज’ – शिखरजी – Shikharji

आपको बता दें कि जैन धर्म का मुख्य तीर्थ स्थल शिखरजी भारत के झारखंड के गिरीडाह जिले में एक छोटे से नागपुर पठार में स्थित है।

इस तीर्थस्थल का जैन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी महत्व है, इस पवित्र तीर्थस्थल में जैन धर्म के 20-24 सर्वोच्च गुरु और तीर्थकरों ने तपस्या करते हुए मोक्ष प्राप्त किया था।

सम्मेद शिखर के नाम से प्रसिद्ध इस पवित्र जैन तीर्थधाम में 23वें तीर्थकर भगवान पार्श्वनाथ ने निर्वाण प्राप्त किया था। इसलिए इस शिखर को उनके नाम पर पार्श्वनाथ शिखर भी कहा जाता है। वहीं यहां पर पार्श्वनाथ पर्वत की वंदना करने का भी जैन धर्म के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व है।

पार्श्वनाथ तीर्थकर का समय 877 ई.पूर्व से 777 ईसा पूर्व माना जाता है। वहीं सम्पूर्ण तीर्थस्थलों में सर्वप्रमुख होने की वजह से यह तीर्थराज कहलाता है अर्थात ‘तीर्थों का राजा’ कहा जाता है।

जैन धर्म के सभी तीर्थकर परम्परागत रुप से अयोध्या में जन्म लेते रहे हैं और सभी ने सम्मेद शिखरजी पर कठोर तप कर मोक्ष की प्राप्ति की है।

सम्मेद शिखर में मुख्य रुप से तीन धार्मिक स्थलों के दर्शन होते हैं, जो कि 13 पंथि कोठी, मझरी कोठी और 20 पंथि कोठी कहलाते हैं। आपको बता दें कि 13 पंथि कोठी में भगवान पदमनाथ की भव्य और विशाल प्रतिमाएं शोभायमान और विराजमान हैं।

इसके साथ ही इस कोठी के मुख्य मंदिर में 13 बीथियां हैं, यह सभी स्वतंत्र जैन मंदिर हैं और इनके ऊपर सुंदर और आर्कषक शिखर बने हुए हैं। इन मंदिरों में कुल मिलाकर 379 मूर्तियां स्थापित हैं, यहां अलग-अलग अवसरों पर भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति की अतिसुंदर रथ यात्राएं भी निकलती हैं।

मझरी कोठी में भी कई मंदिर और सुंदर मूर्तियां हैं। वहीं 20 पंथि कोठी सबसे प्राचीन मानी जाती है, जिसके मुख्य मंदिर में 8 जिनालय बने हुए हैं, जिनके भव्य और आर्कषक शिखर देखते ही बनते हैं।

वहीं इस कोठी के सामने एक विशाल मंदिर स्थापित हैं, जिसमें जैन धर्म के 24 तीर्थकरों की मूर्तियां विराजमान हैं।

सम्मेद शिखरजी में जगह-जगह तीर्थकरों और जैनमुनियों के स्मृति चिंह भी बने हुए हैं, जिन्हें टोंक कहा जाता है। निर्वाण स्थानों पर बने स्मृति चिंह और मंदिरों के दर्शऩ के लिए काफी संख्या में जैन धर्म के लोग आते हैं।

इस पवित्र तीर्थस्थल पार्श्वनाथ पर्वत की सबसे खास बात यह है कि यहां शेर जैसे हिंसक प्राणी भी स्वतंत्र होकर घूमते हैं, और किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते हैं, जो कि इस तीर्थराज की महिमा का प्रत्य़क्ष प्रमाण है।

जैन धर्म के सर्वोच्च तीर्थस्थलों में से एक शिखरजी ‘सिद्धिक्षेत्र’ भी कहलाता है। यह झारखंड के सबसे ऊंचे पहाड़ पर स्थित है, जिसकी ऊंचाई करीब 1350 मीटर है।

जैन धर्म के लोगों के लिए सम्मेद शिखरजी तीर्थयात्रा का भी विशेष महत्व है, वहीं जब यह तीर्थयात्रा शुरु होती है तो उस समय जैन धर्म के अनुयायी अपार श्रद्धा, भाव और आस्था से यहां दर्शन के लिए आते हैं। यहां मुख्य दर्शनीय स्थलों की संख्या करीब 25 है।

वहीं ऐसा माना जाता है कि जैनधर्म को मानने वाला जो भी अनुयायी अपने जीवन में सम्मेद शिखरजी की तीर्थयात्रा पूरी आस्था, निष्ठा और सच्चे भाव से करता है और जैन तीर्थकरों द्धारा बताए गए उपदेशों और सिद्धान्तों का नियमपूर्वक पालन करता है, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और इस दुनिया के सभी जन्म-कर्म के बंधनों से अगले 49 जन्मों तक वह मुक्त रहता है।

यह भी मान्यता है कि जो भी जैन धर्म का अनुयायी सच्चे भाव से तीर्थराज की यात्रा करता है और अपने तीर्थकरों का पूरी श्रद्धा के साथ स्मरण करता है, उसकी मांगी हुई हर मुराद यहां जरूर पूरी होती है।

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि जैन धर्म के सर्वोच्च तीर्थस्थल शिखरजी में जैन धर्म के सिद्धान्त के तहत यहां किसी भी तरह की जीव हिंसा वर्जित है।

सम्मेद शिखऱ का पहाड़ी मार्ग करीब 10 किलोमीटर लंबा है। संवेद शिखरजी की यात्रा के लिए पार्श्वनाथ और गिरिडीह दो मुख्य स्टेशन हैं जहां तीर्थयात्री उतरते हैं।

वहीं शिखर तक पहुंचने के लिए दो मार्ग हैं, पहला मधुपुर की ओर से और दूसरा निमियाघाट की ओर से। हालांकि, मधुपुर होकर जाना तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाजनक है।

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