राजा मंत्री की ज्ञानवर्धक कहानियां

बहुत समय पहले की बात है, एक शहर में एक राजा रहता था| उस राजा को अपने सभी नगरवासियों से बहुत लगाव और प्रेम था| वह सबकी मदद करने के लिए तत्पर रहता| एक सुबह राजा के यहाँ पर एक फ़क़ीर आया, उसने राजा की खातिरदारी और ईमानदारी देखकर राजा को एक चुटकी जितना सुरमा दिया और कहा कि हे राजन, यह सुरमा कोई सामान्य सुरमा नहीं है, यह चमत्कारी सुरमा है|

फ़क़ीर ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि राजन इस सुरमे को जो भी नेत्रहीन अपनी आँखों में लगाएगा उसका अंधापन दूर हो जाएगा और वह फिर से देखने लगेगा| इतना कहकर फ़क़ीर तो राजा को सुरमा देकर अपनी राह पर निकल पड़ा|

राजा ने सोचा कि हमारे राज्य में नेत्रहीनों की संख्या तो बहुत ज्यादा है और सुरमे की मात्रा भी इतनी है कि सिर्फ एक आदमी ही इस सुरमे को अपनी आँखों में डाल सकता है तो क्यूँ न ऐसे आदमी को यह सुरमा दिया जाए जो हर तरह से इसके लायक हो| इसलिए राजा ने अपने अतिप्रिय आदमी को ही सुरमा देने का निश्चय किया|

राजा को तभी अपने इमानदार और प्रमाणिक वृद्ध मंत्री का ख्याल आया| उस मंत्री ने पूरी उम्र ईमानदारी और निष्ठा से राज्य की सेवा की थी, पर दोनों आँखों में तेज चले जाने से मंत्री को राजकार्य में से विदा लेनी पड़ी| अभी तक राजा को उस मंत्री की कमी महसूस हो रही थी|

राजा ने सोचा कि यदि मंत्री की रौशनी वापस आ जाये तो फिर से राज्य को मंत्री की सही और अनुभव भरी सेवा मिल सकती है, इसलिए राजा ने तनिक भी विचार किये बिना ही मंत्री को बुलाया और उनके हाथ में सुरमे की डिब्बी देकर कहा कि “यह सुरमा आप अपनी दोनों आँखों में लगा दो, यह चमत्कारी सुरमा है इसको आँखों में लगाने से आपकी द्रष्टि वापिस आ जाएगी पर यह सुरमा इतना ही है कि इसे सिर्फ दो आँखों में ही लगा सकते हैं| “

मंत्री ने अपनी एक आंख में सुरमा डाला और उस आंख की रौशनी वापस लौट आई| उसके बाद बाकी बचे सुरमे को मंत्री ने अपनी जीभ पर रख दिया| सब लोगों ने सोचा कि मंत्री पागल हो गया है और राजा ने भी उससे कहा कि मंत्री जी यह आपने क्या किया अब आप एक आंख से नहीं देख सकोगे और सभी प्रजाजन आपको काणा कहकर बुलाएँगे|

मंत्री ने राजा को प्यार से अपनी वाणी से समझाया कि हे राजन आप तनिक भी चिंता न करे, मैं बिल्कुल भी काणा नहीं रहूँगा| मेरी दोनों आँखों की रौशनी वापिस आ जाएगी| इससे ज्यादा मैं सभी नेत्रहीनों को भी रौशनी दे सकूँगा| मंत्री ने अपना राज खोलते हुए कहा कि राजन यह सुरमा चखकर मैंने इसको बराबर परख लिया कि यह किससे बना है, अब यह सुरमा बनाकर में सभी नेत्रहीन नगरवासियों का अंधापन दूर कर सकूँगा|

मंत्री की यह बात सुनकर राजा प्रसन्न हो गए और मंत्री को कहा “यह मेरा और इन नगरवासियों का सदभाग्य है जो हमें आपके जैसा राजमंत्री मिला है, जो केवल अपना न सोचकर सभी का ख्याल करता है| “

Moral of the story : लीडर और मंत्री एक बराबर होते हैं, दोनों को अपने अंडर में काम करने वाले आदमियों के बारे में सोचना चाहिए| अपनी सोच को सिर्फ अपने तक न रखकर सभी को उसका लाभ मिले ऐसा कोई कार्य करो| जो अपने अनुभव और अपनी सोच को सही काम में लगाता है, सही मायने में वही लीडर कहलाने के लायक है| अपने अनुभव को सही जगह पर इस्तेमाल करना सीख गए तो सफलता बहुत जल्द आपके कदम चूमेगी|

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एक लीडर यानि नेता के दायित्व को समझाती यह कहानी हमें रवि पारवानी जी ने भेजी है| उनकी वेबसाइट पर भी आप इसी तरह की प्रेरक कहानियां पढ़ सकते हैं| इस प्रेरक कहानी के लिए रवि पारवानी जी का धन्यवाद

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